November 15, 2018

शिव सूत्र : 1 - 7 जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तभेदे तुर्याभोगसंभवः

जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तभेदे तुर्याभोगसंभवः  [शिव सूत्र : 1 - 7]
यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का सातवां सूत्र है |

शाब्दिक अर्थ : जाग्रत अवस्था , स्वप्न अवस्था और सुषुप्त अवस्था के भेद को जो जान लेता है , वही तुर्यावस्था को भोग सकता है |
भावार्थ : साधारण मनुष्य केवल तीन अवस्थाओं को जानता है , जाग्रत अवस्था  (जागना), स्वप्नावस्था (जब हम स्वप्न देखते हैं ) और सुषुप्त अवस्था (जब हम गहरी नीद में होते हैं )| इस सूत्र में भगवान् शिव हमारी जागृति की चार अवस्थाएं बताते हैं | चौथी अवस्था केवल योगियों को ही ज्ञात होती है, जिसे तुर्यावस्था कहा जाता है | इस चौथी अवस्था को जानने के लिए आपको पहले की तीनो अवस्थाओं को समझना ज़रूरी है |
सामान्य जाग्रत अवस्था वो है जब हमें संसार का ज्ञान होता है किन्तु स्वयं का नहीं | इस अवस्था में हम शरीर के बाहर तो झाँक सकते हैं किन्तु अन्दर नहीं | ये अवस्था जाग्रत होते हुए भी हम उस स्वयं से अनभिज्ञ रह जाते हैं जो सबसे ज्यादा जानने योग्य है | इस अवस्था में हम जाग्रत होते हुए भी अपने मन और आत्मा से दूर रहते हैं और केवल व्यर्थ के संसार को सच मानते हैं, जो केवल माया है |
दूसरी अवस्था जिसे हम स्वप्नावस्था कहते हैं , इस में हम केवल बंद आँखों से संसार का प्रतिबिम्ब देख पाते हैं | इस अवस्था में हमारा मन हमें वो प्रतिबिम्ब दिखता है जो हम जाग्रत अवस्था में नहीं कर पाते | इस अवस्था में हमारा मन और मष्तिष्क हमें उन सब चीज़ों की अनुभूति करा सकता है, जिनकी हमने कामना करी हो | स्वप्न हमारे भय को भी विकराल रूप में दिखा सकते हैं , और हमें बिना पंखों के गगन में उड़ा भी सकते हैं | किन्तु इस अवस्था में भी हम स्वयं को जानने से चूक जाते हैं | इस अवस्था में भी संसार हमारा पीछा नहीं छोड़ता , और प्रतिबिम्ब रूप में हमें घेरे रहता है |
तीसरी अवस्था है सुषुप्त अवस्था , जिसमें हम सब चीज़ों को भूल कर केवल नींद में होते हैं | इस अवस्था में न तो हमें संस्सर का ज्ञान होता है, न संसार के प्रतिबिम्ब का और न स्वयं का |
इन तीनो अवस्थाओं में एक बात समान है, वो है स्वयं को न जाना |
इस स्तर पर कुछ लोग ये कह सकते हैं कि हम तो स्वयं को जानते हैं | उनका मत हो सकता है की ये मेरे हाथ हैं , ये मेरे पैर हैं , और इससे ज्यादा स्वयं को जानना क्या है | जो व्यक्ति ऐसा मत रखते हैं उनके लिए ये जानना आवश्यक है कि जो तुम्हारा है वो तुम नहीं हो | मेरा घर मैं नहीं हूँ , मेरे कपडे मैं नहीं हूँ , मेरा भोजन मैं नहीं हूँ , उसी प्रकार मेरा शरीर भी मैं नहीं हूँ | जो मेरा है वो मैं कैसे हो सकता हूँ | मैं तो आत्मा हूँ | तुर्यावस्था वो अवस्था है , जिसमें आपको उस स्वयं की अनुभूति होती है जो इस शरीर से भी परे है |
तुर्यावस्था वह सिद्ध अवस्था है जिसमें मनुष्य अपने आप को जानता है | सब योग और ध्यान उसी अवस्था को पाने के उपाय हैं | इस अवस्था में मनुष्य संसार के साथ-साथ स्वयं को भी जान लेता है, और उसे ये भी पता चल जाता है की इनमें से श्रेष्ठ क्या है | सामान्य जागृत अवस्था एक दीपक की तरह है जो आस पास की वस्तुओं को तो प्रकाशित कर देता है लेकिन खुद दीपक के नीचे अँधेरा रहता है | तुर्यावस्था सूर्य की तरह है जो सभी दिशाओं को एक साथ प्रकाशित कर देता है |
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भारतीय धर्मनिर्पेक्षता : एक राजनितिक छल

धर्मनिर्पेक्षता (Secularism), भारत में इस्तेमाल होने वाला एक ऐसा शब्द बन गया है जिसका उपयोग किसी की भलाई के लिए कम, राजनितिक दलों के इस्तेमाल के लिए ज्यादा हुआ है | यदि आप भारतीय धर्मनिर्पेक्षता के बारे में ज्यादा जानकारी एकत्र करेंगे तो पाएंगे की ये वास्तव में धर्मनिर्पेक्षता है ही नहीं |

November 7, 2018

शिव सूत्र : 1 - 6 शक्तिचक्रसन्धाने विश्वसंहारः

शक्तिचक्रसन्धाने विश्वसंहारः  [शिव सूत्र : 1 - 6]
यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का छठा सूत्र है |

शाब्दिक अर्थ : शक्ति अर्थात शिव का वो अभिन्न हिस्सा जो इस जगत को चला रहा है |चक्र अर्थात एक गोला | संधान शब्द के कई अर्थ हैं जैसे धनुष पर बाण चढ़ाना , निशाना लगाना या मिलाना | विश्वसंहारः अर्थात इस संसार का संहार या अंत |
भावार्थ : समस्त जगत की शक्ति जो शिव का ही एक अभिन्न अंग है और इस जगत को स्वरुप प्रदान किये हुए है, जब वह समस्त शक्तिचक्र एक जगह इकठ्ठा होता है , तब जगत का संहार होता है | शिव का कार्य ही संहार है | जो भी चीज़ उत्त्पन्न हुई है , उसका संहार भी अवश्यम्भावी है | ये समस्त ब्रह्माण्ड भी इसी नियम से बंधा हुआ है | शिव इसका भी संहार करते है | समस्त ब्रह्माण्ड शिव की शक्ति का ही विस्तार है , जब ये समस्त शक्ति एक चक्र बना कर इकट्ठी होती है , तब विश्व का संहार होता है |
इस के अलावा इस सूत्र का एक और भाव भी है | हमारे शरीर में भी कुछ चक्र होते हैं जिन्हें योग के माध्यम से जाग्रत किया जा सकता है | ये चक्र न सिर्फ शक्ति का स्रोत होते हैं, बल्कि अनंत ज्ञान के भी स्रोत होते हैं | जब कोई योगी इन शक्तिचक्रों को साधता है , अर्थात इन्हें जाग्रत करता है , तो इस पहले से ज्ञात विश्व का उसके लिए अस्तित्व मिट जाता है , क्योंकि उस योगी के लिए ये विश्व केवल उस परम शक्ति का विस्तार मात्र रह जाता है | वह ज्ञान के उस बंधन से मुक्त हो जाता है , जिससे एक साधारण मनुष्य जीवन भर बंधा रहता है |
शिव परम योगी हैं , जो सभी तरह की योग विद्याओं के जनक हैं | ऐसी असाधारण बात केवल वही बता सकते हैं|
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November 2, 2018

शिव सूत्र : 1 - 5 उद्यमो भैरवः

उद्यमो भैरवः  [शिव सूत्र : 1 - 5]
यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का पांचवा सूत्र है |

शाब्दिक अर्थ : उद्यम अर्थात एक सार्थक प्रयास | भैरव - शिव का एक रूप जो अत्यंत भयानक है | इस सूत्र का शाब्दिक अर्थ यह है की एक आध्यात्मिक सार्थक प्रयास से ही हम भैरव स्वरुप को समझ सकते हैं |

भावार्थ : शिव सूत्र का हर सूत्र अपने से पिछले और अगले सूत्र से जुड़ा हुआ है | पिछले सूत्र में ये बताया गया था की यह सांसारिक ज्ञान केवल स्वर है, जो हमें जीवन भर अपने नियंत्रण में रखता है | इस सूत्र में थोडा आगे बढ़कर एक सार्थक प्रयास करने की बात कही गयी है , जिससे हम इस माया से मुक्त हो कर उस भैरव स्वरुप को जान सकें | भैरव संहार करते हैं | इसीलिये शिव को काल भैरव भी कहा गया है | वे संहार के देवता हैं | हर जीव और वस्तु की एक आयु है , उसके बाद उसकी मृत्यु या संहार निश्चित है | जो इस मृत्यु को समझ गया , उस भैरव को समझ गया , वही सांसारिक ज्ञान (जो माया है ) से मुक्त हो सकता है | उस भैरव का जानना इतना सरल भी नहीं है | जो सार्थक प्रयास इस भैरव को जानने के लिए करना पड़ता है , वह असाधारण है | कुछ लोग केवल मृत्यु भय से मुक्ति के लिए भैरव की उपासना करते हैं |
इस सूत्र में उद्यम का अर्थ समझना भी महत्वपूर्ण है | कुछ लोग उद्यम को श्रम समझ बैठते हैं, जबकि ये दोनों अलग हैं | श्रम तो शरीर से किया जाता है , जिस प्रकार एक श्रमिक करता है | उद्यम श्रम से श्रेष्ठ है , क्योकि वह सम्पूर्ण चित्त के साथ किया जाता है , और तब तक किया जाता है जब तक सफलता न मिल जाए |
उद्यम को शिव की प्रार्थना समझने की भूल भी न करें | प्राथना भी अक्सर खुद को छलने का तरीका बन जाती है | कुछ लोग तो प्रार्थना भी ऐसे करते हैं जैसे परमात्मा पे उपकार कर रहे हों | कुछ लोगों का प्रार्थना का उद्देश्य केवल माँगना होता है | कुछ लोग ऐसी प्रार्थना करते हैं जैसे परमात्मा को उसकी गलती बता रहें हों , की हम अच्छा आचरण करते हैं फिर भी हम पर कोई उपकार नहीं करते और हमारे दुष्ट पडोसी पर आपने बेवजह कृपा बरसाई हुई है |  ऐसी प्रार्थना उद्यम की श्रेणी में नहीं आती , यह तो केवल व्यापार समझ आती है | उस शिव, उस भैरव को जानने के लिए कोई ध्यान नहीं लगाता, न ही ये कहता है की हे प्रभु हमें अपने स्वरुप से अवगत कराएं | उद्यम तो वह तब है जब आप कृतज्ञ हो कर प्रार्थना करें और उस शिव को जानने के लिए ध्यान लगायें |
पूर्ण समग्रता से उद्यम के बिना उस भैरव को नहीं जाना जा सकता |
मृत्यु को सबसे बड़ा सत्य बताया गया है | भैरव को जानना अर्थात मृत्यु को जानना, जो इस संसार का सबसे बड़ा सत्य है | जिस दिन हम मृत्यु को समझ गए, उस दिन हम उस भैरव के निकट पहुच गए |
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November 1, 2018

शिव सूत्र : 1 - 4 ज्ञानाधिष्ठानं मातृका

ज्ञानाधिष्ठानं मातृका  [शिव सूत्र : 1 - 4]
यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का चौथा सूत्र है |

शाब्दिक अर्थ : ज्ञान अर्थात सांसारिक वस्तुओं की जानकारी जिसकी एक सीमा है | अधिष्ठानं का अर्थ जिसके अधीन रह कर कोई कार्य किया जाए | मातृका शब्द के कई अर्थ हैं - जननी, सौतेली माँ, माँ जैसी, ठोड़ी की आठ विशिष्ट नसें , स्वर और संस्कृत भाषा (जो सब भाषाओँ की जननी है ) | संसार में प्राप्त ज्ञान ही हमें अपने अधीन रखता है , और वही हमारे मुख से भाषा के माध्यम से निकलता है |

भावार्थ : हम जब से इस संसार में जन्म लेते हैं केवल इस संसार का ही ज्ञान प्राप्त करते हैं | हम सभी जाने अनजाने इस ज्ञान के अधीन अपना जीवन व्यतीत करते हैं | यही ज्ञान शब्दों के माध्यम से हमारे मुख से निकलता है |ज्ञानाधिष्ठानं का अर्थ बड़ा गहरा है, हमारा ज्ञान ही हमारे सभी कर्मों का स्रोत है| यह ज्ञान ही हमारा आधार है, यही हमें अपने वशीभूत रखता है , और हम इस भ्रम में जीते हैं की हम स्वतन्त्र हैं | सांसारिक ज्ञान की एक सीमा है | संसार का कोई भी ज्ञान शिव को व्यक्त करने में असमर्थ है | हमारी भाषाएँ भी उसे व्यक्त नहीं कर सकती | संस्कृत जैसी पौराणिक भाषा, जिससे सब भाषाएँ उपजी हैं, वह भी हमारे सांसारिक ज्ञान के अधीन हो कर रह जाती है | दो व्यक्ति एक ही चीज़ को अलग-अलग ढंग से देखते हैं और व्यक्त करते हैं , क्योंकि उनका ज्ञान अलग-अलग है , उनका नजरिया अलग-अलग है |
मातृका शब्द भी बहुत गहरा है | इसके बहुत से अर्थों में एक "स्वर" भी है | पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ये समस्त संसार और ब्रह्माण्ड स्वर से ही उत्त्पन्न हुआ है | स्वर की तरंगें ही समस्त अणुओं और पदार्थों को आकर देती हैं | हम सभी इन्ही स्वर तरंगों से निर्मित हैं | इसीलिये हमारे वेदों में परमात्मा को "नादब्रह्म" भी कहा गया है | नाद एक ऐसा स्वर है जो ब्रह्माण्ड उत्त्पत्ति से पहले भी था और इसके बाद भी रहेगा | समस्त ग्रह, उपग्रह, तारे, वायु, जल, जीव और जीवन इसी नाद का विस्तृत स्वरुप है | हमारे समस्त ज्ञान में यही नाद विद्यमान है, और हमारे समस्त बोले गए शब्दों में भी यही नाद (स्वर) है |
अगर हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो संसार की सबसे छोटी इकाई अणु (Atom) है | इस Atom में बीच में एक Nucleus है, जिसके चारों तरफ electrons चक्कर काटते हैं | ये इलेक्ट्रान कोई तत्व नहीं बल्कि तरंग हैं, जैसे स्वर एक तरंग है |किसी तरंग को एक सीधी रेखा में व्यक्त नहीं किया जा सकता | इस प्रकार इलेक्ट्रान भी सीधे नहीं चलते , बल्कि एक तरंग की तरह ऊपर नीचे होते हुए चलते हैं | Nucleus के भीतर मौजूद proton और neutron भी तरंगों से ज्यादा कुछ नहीं हैं | एक Atom के भीतर तुलनात्मक रूप से अनंत space होता है | Nucleus और electron का आकर उसके Atom की तुलना में कुछ भी नहीं होता | एक Atom की कोई बाहरी दीवार भी नहीं होती | इसलिए एक Atom एक बहुत बड़े स्पेस में घुमती हुई बहुत सारी छोटी छोटी तरंगों का समूह है| इसे यदि एक स्वर तरंग कहा जाए तो कुछ गलत नहीं है | समस्त ब्रह्माण्ड इन्ही छोटे छोटे अणुओं से बना है, जो स्वयं एक तरंग है | हम सभी इन्ही स्वर तरंगों का एक बड़ा समूह हैं |
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October 30, 2018

गोस्वामी तुलसीदास के जीवन के रोचक तथ्य

गोस्वामी तुलसीदास  का नाम सामने आते ही "रामचरितमानस" का स्मरण हो आता है | रामचरितमानस हिन्दुओं की सर्वाधिक प्रिय धार्मिक पुस्तकों में से एक है , जो गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रची गयी थी | इस के अलावा इन्होने हनुमान चालीसा और बजरंग बाण जैसे स्तुतियाँ भी लिखी , जो हिन्दुओं में आज भी कंठस्त पायी जाती हैं | तुलसीदास जी का जीवन बहुत रोचक रहा जिसका ज्ञान आपको नीचे दिए गए तथ्यों से हो जाएगा |

अधिकाँश लोग ये सोचते हैं की तुलसीदास वैदिक काल के कवि हैं , किन्तु सत्य यह है की इनका जन्म सन 1532 में हुआ था और मृत्यु सन 1623 में हुई  | यह वह समय था जब भारतवर्ष पर मुगलों का शासन था | अकबर और तुलसीदास समकालीन थे | तुलसीदास जी के जीवन के कुछ रोचक तथ्य ऐसे हैं जिन्हें ज्यादातर लोग नहीं जानते |

गोस्वामी तुलसीदास के जीवन के रोचक तथ्य


  • तुलसीदास जी के पिता का नाम आत्माराम दुबे था, जो पाराशर गोत्र के सरयूपारीण ब्राह्मण थे , और इनकी माता का नाम हुलसी था |
  • अधिकतर इतिहासकार इनका जन्मस्थान सोरों (शूकरक्षेत्र), कासगंज , उत्तर प्रदेश को मानते हैं | सन 2012 में उत्तर प्रदेश सरकार ने आधिकारिक स्तर पर सोरों को तुलसीदास जी का जन्म स्थान घोषित किया |
  • इतिहासकारों में तुलसीदास के जन्म के वर्ष को ले कर मतभेद है | सन 1497, 1511 और 1532 को अलग अलग पुस्तकों में तुलसीदास का जन्म वर्ष बताया गया है | सन 2011 में भारत सरकार ने तुलसीदास का 500 वां जन्म वर्ष मनाया, इसलिए सन 1511 को प्रमाणित तौर पर तुलसीदास जी का जन्म वर्ष माना जा सकता है |
  • श्रावण मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी दिन अभुक्त मूल नक्षत्र में इनका जन्म हुआ था, जिसे बहुत अशुभ माना गया था | माता  हुलसी इनके जन्म के दो दिन के भीतर ही स्वर्ग सिधार गयी | पिता ने किसी और अनिष्ट से बचने के लिए चुनियाँ नाम की दासी को इन्हें सौंप दिया और स्वयं विरक्त जीवन जीने लगे |
  • कहा जाता है की इन्होने जन्म होने के बाद रोने के स्थान पर राम के नाम का उच्चारण किया था , जिस कारण इनका नाम "रामबोला" पड़ा |
  • कुछ विद्वान ये भी कहते हैं की इनका जन्म 12 माह के गर्भ के पश्चात हुआ था और जन के समय इनके मुह में दांत थे |
  • कहा जाता है की श्रीनरहर्यानन्द जी (नरहरि बाबा) ने भगवान शंकर के प्रेरणा से रामबोला को ढूँढ निकाला और उसे अपने आश्रम में ले आये | उन्होंने इनका नाम "तुलसीराम" रखा व् शिक्षा दीक्षा के लिए इन्हें अयोध्या ले गए |
  • तुलसीराम की बुद्धि विलक्षण थी और एक बार सुन कर ही वे पाठ कंटस्थ कर लेते थे |
  • शिक्षा दीक्षा के उपरांत वे वापस अपने स्थान पर लौट आये और २९ वर्ष के आयु में उनका विवाह  भारद्वाज गोत्र की कन्या रत्नावली के साथ हुआ। 
  • विवाह के उपरान्त गौना न होने के कारण वे अकेले ही थे और वेदों के अध्ययन में जुट गए | एक रात्री उन्हें अपनी पत्नी से मिलने की तीव्र इच्छा हुई और वे उफनती हुई यमुना को पार कर सीधे अपनी पत्नी के शयन कक्ष में चले गए और उसे अपने साथ चलने को कहने लगे | एक ब्राह्मण का ऐसा व्यवहार देख कर रत्नावली ने खेद के साथ ये वचन कहे - "अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति ! नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत ? "| अर्थात इस हाड मांस के शरीर से आपको जितना प्यार है , उससे आधा भी राम से होता तो आप भाव सागर तर जाते | पत्नी के इन शब्दों ने तुलसी को झकझोर दिया | तदुपरांत जब वे वापस अपने घर पहुंचे तो उनकी अनुपस्तिथि में उनके पिता का निधन हो चूका था | इस घटना ने तुलसीराम को तुलसीदास बना दिया | पिता का श्राद्ध करने के पश्चात वे काशी आ गए और सबको रामकथा सुनाने लगे |
  • कहा जाता है की अपने जीवनकाल में तुलसीदास को राम लक्ष्मण व् हनुमान के दर्शन हुए |
  • भगवान् शंकर ने स्वयं प्रकट हो कर तुलसीदास को अयोध्या में रह कर अपनी मात्र भाषा में रामायण को लिखने की प्रेरणा दी |
  • तदुपरांत तुलसीदास अयोध्या आ गए और रामनवमी के दिन काव्यरचना प्रारंभ करी |  दो वर्ष, सात महीने और छ्ब्बीस दिन में उन्होंने रामचरितमानस का पूर्ण किया, और संयोग से यह मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में राम-विवाह की ही तिथि थी |
  • रामचरितमानस, हनुमान चालीसा , विनय-पत्रिका, कवितावली, गीतावली, संकट मोचन हनुमानाष्टक इत्यादि की रचना भी गोस्वामी तुलसीदास जी ने ही करी |
  • उस समय के ब्राह्मणों ने शुरू में रामचरितमानस का विरोध किया और इसे एक धर्म ग्रन्थ नहीं माना क्योंकि यह संस्कृत में नहीं थी | किन्तु कुछ दिव्य घटनाओं के चलते सभी को रामचरितमानस की श्रेष्ठता को मानना पड़ा |
  • संत तुलसीदास ने सन 1623 में श्रावण कृष्ण तृतीया शनिवार को राम-राम कहते हुए काशी के विख्यात् असीघाट पर अपनी देह त्यागी |
  • कुछ दार्शनिक तुलसीदास को ऋषि वाल्मिकी का अवतार भी मानते हैं, जिन्होंने सर्वपूज्य रामायण की रचना करी |


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October 29, 2018

हनुमान चालीसा में सूर्य से पृथ्वी की दूरी बताई गयी है

कुछ विद्वान् ये मानते हैं कि पृथ्वी से सूर्य की दूरी हनुमान चालीसा में बताई गयी है | नीचे दी गयी चौपाई को वे इस बात का आधार मानते हैं |
जुग सहस्र जोजन पर भानू।लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
इस चौपाई का शाब्दिक अर्थ : सूर्य , जो हमसे युग x सहस्र  x योजन  की दूरी पर स्थित है , उसको आपने एक मीठा सा फल समझ के खा लिया |

इस आधार पर सूर्य की दूरी  = युग (12000 वर्ष ) x सहस्र (1000) x योजन (12.3 km)
   = 12000 x 1000 x 12.3 km
   =  147600000 km
   = 147,600,000,000 मीटर

सूर्य से पृथ्वी की दूरी को 1AU (astronomical unit) कहा जाता है , जो 149,597,870,700 मीटर  के बराबर है | ये दूरी आज के आधुनिक उपकरणों से नापी गयी है |

अब अगर हम इस से ये समझें की तुलसीदास जी ने सूर्य से पृथ्वी की दूरी का वर्णन हनुमान चालीसा में कर दिया, तो ये आस्था के हिसाब से गलत नहीं है | दोनों दूरियां लगभग एक सामान ही हैं |

कुछ व्यक्ति इस हिसाब को संशय की दृष्टी से देखते हैं | उनका ये मानना है कि इन तीनो अंकों में केवल सहस्र ही एक ऐसा अंक है जिसका मान बिना किसी संशय के 1000 बताया जा सकता है | युग और योजन का मान अलग अलग पुस्तकों में अलग अलग दिया गया है | कोई व्यक्ति युग का 12000 वर्ष का बताता है, तो कोई 1200 दिव्य वर्ष का और एक दिव्य वर्ष का पृथ्वी के 360 वर्षों के बराबर भी बताया गया है |
विकिपीडिया पर एकत्रित जानकारी के अनुसार चारों युगों की अवधि अलग अलग है , कलियुग 1200 दिव्य वर्ष , द्वापर युग 2400 दिव्य वर्ष , त्रेता युग 3600 दिव्य वर्ष और सतयुग 4800 दिव्य वर्ष के बताये गए हैं | इस प्रकार चारों युगों को मिला कर बनने वाला एक महा-युग 12000 दिव्य वर्षों के बराबर बनता है , जिसका उल्लेख हनुमान चालीसा की इस चौपाई में हुआ है | हालांकि इस चौपाई में "महा-युग" शब्द का प्रयोग न करके केवल "युग" शब्द का प्रयोग हुआ है | किन्तु एक कवि को पंक्तियों में ताल मेल बिठाने के लिए शब्दों में इतना हेर फेर तो करना ही पड़ता है |

योजन एक संस्कृत भाषा का शब्द है जिसे दूरी नापने के लिए वैदिक काल से उपयोग किया जा रहा है | अलग अलग समय और स्थान पर इसकी लम्बाई अलग अलग पाई गई है | वैसे एक योजन को 4 कोस के बराबर माना जाता है , और कोस लगभग 2 से 3.5 km का होता है | इस प्रकार योजन की लम्बाई 12 से 15 km के बराबर होती है | अर्थशास्त्र में दिए गए तथ्यों के अनुसार योजन की सर्वमान्य लम्बाई 12.3 km है |

इन तीनो अंकों की गुणा से जो अंक प्राप्त होता है वह सूर्य की लगभग औसत दूरी ही है |

अब यदि हम थोडा और गहराई में जाएँ तो ये प्रश्न मन में उठता है की क्या गोस्वामी तुलसीदास जी ने पृथ्वी से सूर्य की दूरी की गणना करी थी | इस का बड़ा सरल सा जवाब है , नहीं | तुलसीदास जी सोलहवी सदी के कवि थे , जो केवल 500 साल पुरानी बात है | उस समय से पहले ही बहुत से खगोलीय खोजें हो चुकी थी | वैसे भी भारत वैदिक काल से ही महान विद्वानों और गणितज्ञों की भूमि रही है | शून्य की खोज से लेकर ज्यामिति (Geometry) तक की खोज में इनका योगदान रहा है | इसलिए सूर्य की दूरी भी इस समय से पहले ही भारतीय विद्वानों ने खोज ली होगी , जिसका वर्णन तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा में किया है |
लगभग 250 BC में Aristarchus नामक ग्रीक विद्वान ने सूर्य की दूरी खोज ली थी और सन 1653 में पश्चिमी विद्वान Christiaan Huygens ने भी यह खोज की थी | पुराने समय में अपनी खोजों को पेटेंट (Patent) कराने की कोई व्यवस्था नहीं थी , अन्यथा भारतीय विद्वानों के नाम अनगिनत और खोजों के पेटेंट होते |

हनुमान चालीसा की चौपाई से ये प्रमाणित होता है की भारत के विद्वानों को सूर्य की दूरी ज्ञात थी और शायद यह पुराने गुरुकुलों में पढाई भी जाती थी , इसीलिये गोस्वामी तुलसीदास ने इतनी सरलता से इसे पंक्तिबद्ध भी कर दिया |
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October 25, 2018

हनुमान चालीसा का हिंदी अनुवाद (Hanuman Chalisa Hindi Meaning)

रचयता : तुलसीदास (प्रसिद्ध हिंदी / अवधि कवि)
भाषा : अवधि
रचना का वर्ष : सोलहवी सदी

हनुमान भगवान शिव के रूद्र-अवतार हैं और उन्हें उनके बल, पराक्रम, विद्वता और भक्ति के लिए जाना जाता है | हनुमान को उनकी अमरता के लिए भी जाना जाता है | उनके भक्तों में हनुमान चालीसा सबसे प्रसिद्ध प्रार्थनाओं में से एक है | भक्त ये मानते हैं की जो इस प्रार्थना को नियमित रूप से करता है , वह सदा निर्भय रहता है, उसके बुद्धि सदा सही मार्ग पर रहती है और कोई भी आसुरी शक्ति उसके निकट आने का साहस नहीं करती |

हनुमान चालीसा में दो दोहे व चालीस चौपाई हैं , जिनका अर्थ बताना का प्रयास इस प्रष्ठ पर किया गया है |

हनुमान चालीसा का हिंदी अनुवाद

हनुमान चालीसा हिंदी अनुवाद
दोहा :
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।
अपने गुरु के चरण कमलों की धूल से अपने मन के दर्पण को पवित्र करता हूँ |
रघुवीर के निर्मल यश की व्याख्या करता हूं, जो चारों फलों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाले हैं |
हे पवन कुमार तुम्हारे समक्ष मैं बुद्धिहीन तुम्हारा स्मरण करता हूँ |
मुझे बल , बुद्धि व् विद्या दें व् मेरे सब दुःख और विकार हर लें |
चौपाई :
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।
हे हनुमान आप ज्ञान व् गुण के सागर हैं |
हे वानर राज आपका यश तीनों लोकों में ज्ञात है |
रामदूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।
हे रामदूत आप के बल की कोई तुलना नहीं है |
हे माता अंजनि के पुत्र , पवन पुत्र  भी आपका ही नाम है |
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।
हे महावीर आपकी देह वज्र की है |
आप ख़राब बुद्धि को सही करने वाले हैं |
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा।।
आप स्वर्ण सामान रंग वाले और सुंदर वेश भूषा वाले हैं |
आपके कानो में कुंडल हैं व् आपके बाल घुंघराले हैं |
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
कांधे मूंज जनेऊ साजै।।
आपके हाथ में गदा (बज्र) और राम ध्वज (झंडा) है |
आपके कंधे पर मूंज का जनेऊ सजा हुआ है |
संकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग बन्दन।।
आप भगवान शंकर के अंश हैं और वानरराज केसरी के पुत्र हैं |
आपका तेज और प्रताप सम्पूर्ण जगत में वन्दनीय है |
विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।।
आप विद्वान् हैं , गुणी हैं व् अत्यंत चतुर हैं |
आप श्री राम के काम करने को सदा आतुर रहते हैं |
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।
श्री राम का चरित्र वर्णन सुनने में आप को रस (प्रसन्नता) प्राप्त होता है |
राम, लक्ष्मण और माता सीता आपके मन में बसते हैं |
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा।।
सूक्ष्म रूप धर के आप माता सीता के समक्ष गए |
विशाल रूप धर के आपने लंका दहन किया |
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचंद्र के काज संवारे।।
भीमकाय रूप धर कर आपने असुरों का संहार किया |
श्री राम के कार्य आपने संवारे हैं |
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।
संजीवनी बूटी ला कर आपने लक्ष्मण को नया जीवन दिया |
श्री रघुबीर (श्री राम) इस प्रसंग से अत्यंत हर्षित हुए |
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।
श्री राम ने आपकी बहुत प्रशंसा करी |
और कहा की तुम मेरे प्रिय भाई भरत के समान हो | 
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।
श्रीराम के अनुसार उनके हज़ार शरीर भी हनुमान का यश गाने के लिए का हैं |
यह कह कर श्री राम ने हनुमान को गले से लगा लिया |
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा।।
श्री सनातन ऋषि , ब्रह्मा व् अन्य मुनि ,
नारद, सरस्वती व् शेषनाग भी आपके गुण गाते हैं |
जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।
यमराज, कुबेर , सभी दिशाओं के रक्षक ,
कवि , विद्वान् व् पंडित भी आपका वर्णन करने में असमर्थ हैं |
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा।।
आपने वानरराज सुग्रीव के ऊपर उपकार किया |
और उन्हें श्री राम से मिला कर राजा का पद दिलवाया |
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भए सब जग जाना।।
आपकी बात को विभीषण ने माना |
और लंका के राजा बने , ये तथ्य सारा संसार जानता है |
जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
सूर्य , जो हमसे युग (१२००० वर्ष ) x सहस्र (१०००) x योजन (१२.3 km) की दूरी पर स्थित है |
उसको आपने एक मीठा सा फल समझ के खा लिया |
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।
आपने प्रभु श्री राम की अंगूठी को मुंह में रखा
और समुद्र को लांघ लिया, जिसमें कोई अचरज नहीं है |
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।
इस जगत के जितने भी दुर्गम कार्य हैं ,
आपकी कृपा से वे सब आसान हो जाते हैं |
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
श्री राम के द्वार के आप रखवाले हैं,
और आपकी आज्ञा (प्रसन्नता) के बिना कोई श्री राम तक पहुँच नहीं सकता |
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना।।
जो भी आपकी शरण में आता है, उसे सब सुख प्राप्त होते हैं |
आप जिसके रक्षक हो उसे किसी का डर नहीं रहता |
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै।।
आपके तेज (बल व वेग ) को आपके सिवा कोई संभाल नहीं सकता |
तीनो लोक आपकी गर्जना से कांप उठते हैं |
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै।।
भूत पिशाच उस जगह के निकट भी नहीं आते ,
जहाँ महावीर हनुमान का नाम लिया जाता है |
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा।।
आप उनकी सभी रोगों और पीडाओं को आप हरते हैं ,
जो आपका नाम निरंतर जपते हैं |
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
आप उनको सब संकटों से छुडाते हैं ,
जो अपने मन, कर्म और वचन में आपका ध्यान लगाते हैं |
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा।
तपस्वी श्री राम सबसे श्रेष्ठ राजा हैं ,
जिनके सभी कार्य आपने बड़ी सरलता से कर दिए |
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै।।
जो भी भक्त आपके समक्ष कोई अभिलाषा लाता है ,
उसे आप जीवन में असीमित फल देते हैं |
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा।।
चारों युगों में आपका यश फैला हुआ है |
आपकी सिद्धि (कीर्ति) सारे जगत में प्रकाशमान है |
साधु-संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे।।
आप साधु और संत (सज्जन) पुरुषों की रक्षा करते हैं |
आप श्री राम के दुलारे हैं और असुरों का नाश करने वाले हैं |
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता।।
आप आठ सिद्धियों और नौ निधियों के देने वाले हैं |
ये सामर्थ्य आपको माता जानकी के वरदान से प्राप्त है |
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।।
आपके पास असाध्य रोगों को हरने वाली राम नाम की औषधि है |
श्री राम का दास सदा बने रहने का सौभाग्य आपके पास है |
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै।।
आप के भजनों से भी राम की प्राप्ति होती है |
और जन्म जन्म के दुःख दूर हो जाते हैं |
अन्तकाल रघुबर पुर जाई।
जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।।
शरीर का अंत होने पर भक्त रघुवर के धाम को जाते हैं |
और जहाँ जन्म लेते हैं वहां राम-भक्त ही कहलाते हैं |
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।
जो भक्त आपकी भक्ति करते हैं उन्हें किसी अन्य देवता की आवश्यकता नहीं |
आपकी सेवा करने से सब सुख प्राप्त होते हैं |
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
उनके सब संकट कट जाते हैं और सब पीड़ा मिट जाती हैं,
जो हनुमान का स्मरण मन से करते हैं |
जै जै जै हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।
हे स्वामी हनुमान ! आपकी जय हो ! जय हो ! जय हो !
आप गुरुदेव के सामान मुझ पर कृपा बनाएं रखें |
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई।।
जो सौ बार इस हनुमान चालीसा का पाठ करेगा ,
वह सब बन्धनों से छूट जाएगा और महान सुख को प्राप्त करेगा |
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
जो इस हनुमान चालीसा को पढ़ेगा ,
उसे सफलता (सिद्धि) प्राप्त होगी, भगवान् शंकर इसके साक्षी हैं |
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।।
 तुलसीदास सदा हरी (श्री राम) के दास हैं |
इसलिए हे नाथ (हनुमान) आप भी मेरे हृदय में वास करिए |
दोहा :
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।
हे संकटों को हरने वाले पवन कुमार और आनंद मंगल स्वरुप ,
आप राम लक्ष्मण और सीता सहित मेरे हृदय में वास करिए |


हरी अनंत हरी कथा अनंता , कहत हो बहु विधि सब संता |

इस हिंदी अनुवाद में यदि कोई त्रुटी हुई हो तो मै क्षमाप्रार्थी हूँ | इस में सुधार हेतु आप कमेंट्स में भी लिख सकते हैं |
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October 13, 2018

शिव सूत्र : 1 - 3 योनिवर्गः कलाशरीरम्

योनिवर्गः कलाशरीरम्  [शिव सूत्र : 1 - 3]
यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का तीसरा सूत्र है |
शाब्दिक अर्थ : योनि अर्थात वो स्रोत जिससे हम उपजे हैं | वर्ग अर्थात समाज या प्रकृति का एक हिस्सा | कला अर्थात कर्ता का भाव | शरीर अर्थात ये देह | हमारे मन में पल रहा करता का भाव ही हमें अलग अलग प्रकार के शरीर और योनियों में भेजता है |
भावार्थ : यह सूत्र बहुत गहरा है | अक्सर लोग वर्ग शब्द आने पर समाजिक वर्गों से आगे नहीं बढ़ पाते | किन्तु शिव की द्रष्टि बहुत गहरी है | योनी का अर्थ प्रकृति या स्त्री भी होता है | योनी शब्द का उपयोग केवल मनुष्यों के लिए नहीं बल्कि किसी भी जीव के लिए हो सकता है | कलाशरीरम्  अर्थात "हमारे मन का करता का भाव" ही हमें शरीर की प्राप्ति कराता है | हमारा मन जिस चीज़ को पाने को लालायित रहता है , हम उसी के अनुरूप शरीर पाने की तरफ अग्रसर हो जाते हैं | प्रकृति तो योनी है, वह गर्भ है ,  हमारी इच्छा (हमारे करता भाव ) के अनुरूप हमें शरीर प्रदान करती है |
इस सूत्र को यदि हम गहराई से समझें तो हम अपने दुखों के लिए कभी किसी दूसरे को दोषी नहीं बनायेंगे | हम आज जो भी हैं वो अपने कर्मों के कारण ही हैं | कुछ व्यक्ति ये समझते हैं की उन्होंने कभी किसी का बुरा नहीं किया , फिर उन्हें दुःख क्यों प्राप्त हो रहा है | यही एक साधारण व्यक्ति की सबसे बड़ी भूल होती है | इंसान अन्याय कर सकता है , किन्तु प्रकृति नहीं | हमारे मन में उत्पन्न हर विचार एक बीज है , जो अंकुरित भी होता है और वृक्ष भी बनता है | ये बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर होता है | हमारे कृत्य चाहे अच्छे हों या बुरे किन्तु उनके पीछे हमारे मन का भाव (करता का भाव ) ही हमारा असली कर्म होता है | एक सत्य वचन भी द्वेष वाले मनोभाव से कहा जा सकता है , फिर ये सोचना की आपने सदा सत्य बोला है या सत्य का साथ दिया है , उससे कोई फर्क नहीं पड़ता | इसी प्रकार एक असत्य वचन बोलने के पीछे क्या भाव है , वह हमारे कर्मफल का कारण बनता है |
हमारा मनोभाव ही हमारे शरीर का निर्माण करता है | इस जन्म में हमारे भाव हमारे शरीर के अच्छे व् बुरे विकारों का निर्माण करते हैं | इसे प्रकार जीवन के अंत के हमारे भाव हमारे भावी गर्भ और प्रवृति निर्धारित करते हैं | एक व्यक्ति जो सदा उड़ने का विचार मन में रखता है , वह एक पक्षी के गर्भ से नया जन्म ले सकता है | वह व्यक्ति जो सदा कामवासना से ग्रसित रहता है, वह किसी ऐसी योनी में नया जन्म ले सकता है जहाँ ऐसी वासना की पूर्ती आसानी से हो सके |
"योनिवर्गः कलाशरीरम्" का अर्थ एक पंक्ति में ये समझा जा सकता है की "हमारा शरीर (योनी) हमारे मनोभावों द्वारा निर्धारित होता है " |
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October 10, 2018

शिव सूत्र : 1 - 2 ज्ञानं बन्धः

ज्ञानं बन्धः [शिव सूत्र : 1 - 2]
यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का दूसरा सूत्र है |
शाब्दिक अर्थ : ज्ञान बंधन है |
भावार्थ : इस सूत्र में भगवान् शिव ज्ञान को एक प्रकार का बंधन बता रहे हैं | ज्ञान भौतिक भी होता है और अध्यात्मिक भी | यहाँ भौतिक ज्ञान को बंधन बताया गया गया है | यह भौतिक ज्ञान जिसे हम विशेष-ज्ञान या विज्ञान समझते है, एक प्रकार का बंधन है, जो हमें अपनी वास्तविकता (हमारी आत्मा ) को जानने से रोकता है | एक साधारण मनुष्य समझता है की विज्ञान को समझ कर वो सम्पूर्ण सृष्टि को समझ सकता है , जो केवल एक भ्रम है | ये वैसा ही है की कोई पुरुष किसी स्त्री के शरीर की पूरी जानकारी एकत्र कर के, या उसके शरीर के साथ सम्बन्ध स्थापित करके ये सोचे की उसने उसे पा लिया | जबकि पाने का असली अर्थ तो उसके प्रेम को पाना है | शरीर तो एक बलात्कारी भी पा लेता है , किन्तु प्रेम नहीं | इसी प्रकार ज्ञान हमें इस सृष्टि के चलने के नियम बता सकता है, ग्रुत्वाकर्षण और अनंत ब्रह्माण्ड की तसवीरें दिखा सकता है, किन्तु उस सृष्टा से जो हमारी आत्मा में बसा हुआ है, उस से अवगत नहीं करा सकता | भौतिक ज्ञान हमें Extrovert (बहिर्मुखी) बनाता है और हम अपने अन्दर झांकने की कभी कोशिश ही नहीं करते | हम कभी अपने अपने मन को जानने की कोशिश ही नहीं करते, आत्मा की तो बात ही छोड़ दीजिये | बाहर का ज्ञान हमें आकर्षित करता है और उलझाये रखता है | जिस प्रकार सृष्टि का कोई अंत नहीं है , उसी प्रकार इस ज्ञान का भी कोई अंत नहीं है | जिस पल हम ये समझ जाते हैं की ये ज्ञान ही बंधन है , उसी पल से हम अपने और उस सृष्टा के और निकट हो जाते है | ज्ञान बंधन अवश्य है किन्तु ये बंधन भी उसी शिव का बनाया हुआ है | इस अनंत विज्ञान का कुछ हिस्सा जानने के बाद ही हमें ये अनुभूति हो सकती है की ये ज्ञान बंधन है |
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