October 13, 2018

शिव सूत्र : 1 - 3 योनिवर्गः कलाशरीरम्

योनिवर्गः कलाशरीरम्  [शिव सूत्र : 1 - 3]
यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का तीसरा सूत्र है |
शाब्दिक अर्थ : योनि अर्थात वो स्रोत जिससे हम उपजे हैं | वर्ग अर्थात समाज या प्रकृति का एक हिस्सा | कला अर्थात कर्ता का भाव | शरीर अर्थात ये देह | हमारे मन में पल रहा करता का भाव ही हमें अलग अलग प्रकार के शरीर और योनियों में भेजता है |
भावार्थ : यह सूत्र बहुत गहरा है | अक्सर लोग वर्ग शब्द आने पर समाजिक वर्गों से आगे नहीं बढ़ पाते | किन्तु शिव की द्रष्टि बहुत गहरी है | योनी का अर्थ प्रकृति या स्त्री भी होता है | योनी शब्द का उपयोग केवल मनुष्यों के लिए नहीं बल्कि किसी भी जीव के लिए हो सकता है | कलाशरीरम्  अर्थात "हमारे मन का करता का भाव" ही हमें शरीर की प्राप्ति कराता है | हमारा मन जिस चीज़ को पाने को लालायित रहता है , हम उसी के अनुरूप शरीर पाने की तरफ अग्रसर हो जाते हैं | प्रकृति तो योनी है, वह गर्भ है ,  हमारी इच्छा (हमारे करता भाव ) के अनुरूप हमें शरीर प्रदान करती है |
इस सूत्र को यदि हम गहराई से समझें तो हम अपने दुखों के लिए कभी किसी दूसरे को दोषी नहीं बनायेंगे | हम आज जो भी हैं वो अपने कर्मों के कारण ही हैं | कुछ व्यक्ति ये समझते हैं की उन्होंने कभी किसी का बुरा नहीं किया , फिर उन्हें दुःख क्यों प्राप्त हो रहा है | यही एक साधारण व्यक्ति की सबसे बड़ी भूल होती है | इंसान अन्याय कर सकता है , किन्तु प्रकृति नहीं | हमारे मन में उत्पन्न हर विचार एक बीज है , जो अंकुरित भी होता है और वृक्ष भी बनता है | ये बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर होता है | हमारे कृत्य चाहे अच्छे हों या बुरे किन्तु उनके पीछे हमारे मन का भाव (करता का भाव ) ही हमारा असली कर्म होता है | एक सत्य वचन भी द्वेष वाले मनोभाव से कहा जा सकता है , फिर ये सोचना की आपने सदा सत्य बोला है या सत्य का साथ दिया है , उससे कोई फर्क नहीं पड़ता | इसी प्रकार एक असत्य वचन बोलने के पीछे क्या भाव है , वह हमारे कर्मफल का कारण बनता है |
हमारा मनोभाव ही हमारे शरीर का निर्माण करता है | इस जन्म में हमारे भाव हमारे शरीर के अच्छे व् बुरे विकारों का निर्माण करते हैं | इसे प्रकार जीवन के अंत के हमारे भाव हमारे भावी गर्भ और प्रवृति निर्धारित करते हैं | एक व्यक्ति जो सदा उड़ने का विचार मन में रखता है , वह एक पक्षी के गर्भ से नया जन्म ले सकता है | वह व्यक्ति जो सदा कामवासना से ग्रसित रहता है, वह किसी ऐसी योनी में नया जन्म ले सकता है जहाँ ऐसी वासना की पूर्ती आसानी से हो सके |
"योनिवर्गः कलाशरीरम्" का अर्थ एक पंक्ति में ये समझा जा सकता है की "हमारा शरीर (योनी) हमारे मनोभावों द्वारा निर्धारित होता है " |
Read More
भारतीय धर्मनिर्पेक्षता : एक राजनितिक छल

धर्मनिर्पेक्षता (Secularism), भारत में इस्तेमाल होने वाला एक ऐसा शब्द बन गया है जिसका उपयोग किसी की भलाई के लिए कम, राजनितिक दलों के इस्तेमाल के लिए ज्यादा हुआ है | यदि आप भारतीय धर्मनिर्पेक्षता के बारे में ज्यादा जानकारी एकत्र करेंगे तो पाएंगे की ये वास्तव में धर्मनिर्पेक्षता है ही नहीं |

October 10, 2018

शिव सूत्र : 1 - 2 ज्ञानं बन्धः

ज्ञानं बन्धः [शिव सूत्र : 1 - 2]
यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का दूसरा सूत्र है |
शाब्दिक अर्थ : ज्ञान बंधन है |
भावार्थ : इस सूत्र में भगवान् शिव ज्ञान को एक प्रकार का बंधन बता रहे हैं | ज्ञान भौतिक भी होता है और अध्यात्मिक भी | यहाँ भौतिक ज्ञान को बंधन बताया गया गया है | यह भौतिक ज्ञान जिसे हम विशेष-ज्ञान या विज्ञान समझते है, एक प्रकार का बंधन है, जो हमें अपनी वास्तविकता (हमारी आत्मा ) को जानने से रोकता है | एक साधारण मनुष्य समझता है की विज्ञान को समझ कर वो सम्पूर्ण सृष्टि को समझ सकता है , जो केवल एक भ्रम है | ये वैसा ही है की कोई पुरुष किसी स्त्री के शरीर की पूरी जानकारी एकत्र कर के, या उसके शरीर के साथ सम्बन्ध स्थापित करके ये सोचे की उसने उसे पा लिया | जबकि पाने का असली अर्थ तो उसके प्रेम को पाना है | शरीर तो एक बलात्कारी भी पा लेता है , किन्तु प्रेम नहीं | इसी प्रकार ज्ञान हमें इस सृष्टि के चलने के नियम बता सकता है, ग्रुत्वाकर्षण और अनंत ब्रह्माण्ड की तसवीरें दिखा सकता है, किन्तु उस सृष्टा से जो हमारी आत्मा में बसा हुआ है, उस से अवगत नहीं करा सकता | भौतिक ज्ञान हमें Extrovert (बहिर्मुखी) बनाता है और हम अपने अन्दर झांकने की कभी कोशिश ही नहीं करते | हम कभी अपने अपने मन को जानने की कोशिश ही नहीं करते, आत्मा की तो बात ही छोड़ दीजिये | बाहर का ज्ञान हमें आकर्षित करता है और उलझाये रखता है | जिस प्रकार सृष्टि का कोई अंत नहीं है , उसी प्रकार इस ज्ञान का भी कोई अंत नहीं है | जिस पल हम ये समझ जाते हैं की ये ज्ञान ही बंधन है , उसी पल से हम अपने और उस सृष्टा के और निकट हो जाते है | ज्ञान बंधन अवश्य है किन्तु ये बंधन भी उसी शिव का बनाया हुआ है | इस अनंत विज्ञान का कुछ हिस्सा जानने के बाद ही हमें ये अनुभूति हो सकती है की ये ज्ञान बंधन है |
Read More

October 8, 2018

शिव सूत्र : 1 - 1 चैतन्यमात्मा

चैतन्यमात्मा  [शिव सूत्र 1 - 1 ]
यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का प्रथम सूत्र है |
शाब्दिक अर्थ : चैतन्य ही आत्मा है | चैतन्य अर्थात हमारे मन की जाग्रत अवस्था |
भावार्थ : इस सूत्र में भगवान शिव ने आत्मा शब्द का अर्थ बताया है | ज्यादातर हिन्दू इस तथ्य से अवगत हैं की हमारे शारीर के भीतर एक आत्मा विद्यमान है | किन्तु उस आत्मा को जाने का अवसर कुछ जाग्रत मनुष्यों को ही मिलता है | एक साधारण मनुष्य केवल अपने मन और शरीर से ही बंधा रहता है | हमारा मन हमें वासनाओ से ग्रसित रखता है | ये वासना किसी वस्तु को पाने की , किसी का प्यार पाने की , किसी का शरीर पाने की या किसी अन्य भौतिक सुख को पाने की हो सकती है | हमारा मन ही हमें हमारी आत्मा तक पहुचने से रोकता है , क्योंकि वो जाग्रत अवस्था जिसमें हमें हमारी आत्मा की अनुभूति होती है , वो अवस्था हमारे मन के पार जा के ही हो सकती है | आसन शब्दों में, हमारी आत्मा हमारे मन का ही जाग्रत स्वरुप है | जब एक व्यक्ति जाग्रत अवस्था में पहुचता है, तो उसका मन उसे नहीं चला सकता , बल्कि उसका मन उसके अनुसार चलता है | जाग्रत होने के पश्चात् हमारा मन रह ही नहीं जाता , जो रहता है वो केवल जाग्रत आत्मा है |
Read More

शिव सूत्र : संस्कृत से हिंदी भावार्थ सहित (Shiv Sutra Hindi Translation)

शिव सूत्र कुछ ऐसे सूत्रों का संकलन है जो हमें आध्यात्मिक ज्ञान की उस उंचाई से अवगत कराती है , जो शायद भगवद गीता जैसे महाकाव्यों में ही मिलती है | शिव सूत्र की रचना ऋषि वासुगुप्त ने नवी शताब्दी में कश्मीर के महादेव पर्वत के निकट की थी | कहा जाता है की किसी सिद्ध पुरुष या स्वयं भगवान् शिव ने उनके स्वप्न में आकर ये सूत्र उनको बताये थे | कुछ विद्वानों का ये भी मानना है की भगवान् शिव ने ऋषि वासुगुप्त को एक चट्टान के बारे में बताया था जिस पर ये सभी सूत्र लिखे हुए थे | उस चट्टान का नाम शंकरोपला है, जिसके दर्शन करने लोग आज भी जाते हैं | हालाँकि अब उस चट्टान पर वे सूत्र नहीं दिखते | शिव सूत्र को माहेश्वर सूत्राणि के नाम से भी जाना जाता है |
सूत्र अक्सर छोटे होते हैं, इसीलिये इन्हें सूत्र कहते हैं | किन्तु इन सूत्रों को केवल एक छोटा वाक्य समझने की भूल मत करना, क्योंकि हर सूत्र बहुत गहरा है | इनका शाब्दिक अर्थ चाहे छोटा लगे किन्तु भावार्थ बड़ा है | हर सूत्र का शब्दार्थ एक हो सकता है , किन्तु हर ज्ञानी पुरुष अपनी बुद्धिमत्ता और भाव के अनुसार अलग अलग भावार्थ तक पहुच सकता है | भावार्थ भाव से उत्त्पन्न होता है , शब्दकोष से नहीं | एक शब्द के कई अर्थ हो सकते हैं , लेकिन ये आपके भाव पर निर्भर करता है कि आप किस अर्थ को सही समझें | सूत्र में आयतन कम होता है , और घनत्व अधिक | इसलिए एक सूत्र की व्याख्या करने के लिए एक दिन भी कम पड़ सकता है | हर सूत्र एक बीज है , किसी को उसमें एक वृक्ष दिख सकता है और किसी को नहीं |
शिव सूत्र को वैदिक संस्कृत भाषा में लिखा गया था जिसका ज्ञान आज बहुत कम व्यक्तियों को है | इन सूत्रों का अर्थ आपको समझाने के लिए इनका संस्कृत से हिंदी संवाद इस पेज पर दिया गया है | शिव सूत्र में कुल ३ अध्याय और ७७ सूत्र हैं|

शिव सूत्र


- शाम्भवोपाय

चैतन्यमात्मा । १-१। - अर्थ 
ज्ञानं बन्धः । १-२। अर्थ 
योनिवर्गः कलाशरीरम् । १-३। अर्थ 
ज्ञानाधिष्ठानं मातृका । १-४।
उद्यमो भैरवः । १-५।
शक्तिचक्रसन्धाने विश्वसंहारः । १-६।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तभेदे तुर्याभोगसंभवः । १-७।
ज्ञानं जाग्रत् । १-८।
स्वप्नो विकल्पाः । १-९।
अविवेको मायासौषुप्तम् । १-१०।
त्रितयभोक्ता वीरेशः । १-११।
विस्मयो योगभूमिकाः । १-१२।
इच्छा शक्तिरुमा कुमारी । १-१३।
दृश्यं शरीरम् । १-१४।
हृदये चित्तसंघट्टाद् दृश्यस्वापदर्शनम् । १-१५।
शुद्धतत्त्वसन्धानाद् वा अपशुशक्तिः । १-१६।
वितर्क आत्मज्ञानम् । १-१७।
लोकानन्दः समाधिसुखम् । १-१८।
 शक्तिसन्धाने शरीरोत्पत्तिः । १-१९।
भूतसन्धान भूतपृथक्त्व विश्वसंघट्टाः । १-२०।
शुद्धविद्योदयाच्चक्रेशत्व सिद्धिः । १-२१।
महाह्रदानुसन्धानान्मन्त्रवीर्यानुभवः । १-२२।

२- शाक्तोपाय

चित्तं मन्त्रः । २-१।
प्रयत्नः साधकः । २-२।
विद्याशरीरसत्ता मन्त्ररहस्यम् । २-३।
गर्भे चित्तविकासोऽविशिष्ट विद्यास्वप्नः । २-४।
विद्यासमुत्थाने स्वाभाविके खेचरी शिवावस्था । २-५।
गुरुरुपायः । २-६।
मातृकाचक्रसम्बोधः । २-७।
शरीरं हविः । २-८।
ज्ञानं अन्नम् । २-९।
विद्यासंहारे तदुत्थ स्वप्न दर्शनम् । २-१०।

३- आणवोपाय

आत्मा चित्तम् । ३-१।
ज्ञानं बन्धः । ३-२।
कलादीनां तत्त्वानां अविवेको माया । ३-३।
शरीरे संहारः कलानाम् । ३-४।
नाडी संहार भूतजय भूतकैवल्य भूतपृथक्त्वानि । ३-५।
मोहावरणात् सिद्धिः मोहावरणात् । ३-६।
मोहजयाद् अनन्ताभोगात् सहजविद्याजयः अनन्ताभोगात् । ३-७।
जाग्रद् द्वितीयकरः । ३-८।
नर्तक आत्मा । ३-९।
रङ्गोऽन्तरात्मा । ३-१०।
प्रेक्षकाणीन्द्रियाणि । ३-११।
धीवशात् सत्त्वसिद्धिः धीवशात् । ३-१२।
सिद्धः स्वतन्त्रभावः । ३-१३।
यथा तत्र तथान्यत्र । ३-१४।
विसर्गस्वाभाव्याद् अबहिः स्थितेस्तत्स्थितिः । ३-१५।
बीजावधानम् । ३-१६।
आसनस्थः सुखं ह्रदे निमज्जति । ३-१७।
स्वमात्रा निर्माणं आपादयति । ३-१८।
विद्या अविनाशे जन्म विनाशः । ३-१९।
कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः । ३-२०।
त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेच्यम् । ३-२१।
मग्नः स्वचित्तेन प्रविशेत् । ३-२२।
प्राण समाचारे समदर्शनम् । ३-२३।
मध्येऽवर प्रसवः । ३-२४।
मात्रास्वप्रत्यय सन्धाने नष्टस्य पुनरुत्थानम् । ३-२५।
शिवतुल्यो जायते । ३-२६।
शरीरवृत्तिर्व्रतम् । ३-२७।
कथा जपः । ३-२८।
दानं आत्मज्ञानम् । ३-२९।
योऽविपस्थो ज्ञाहेतुश्च । ३-३०।
स्वशक्ति प्रचयोऽस्य विश्वम् । ३-३१।
स्तिथिलयौ । ३-३२।
तत् प्रवृत्तावप्यनिरासःतत् प्रवृत्तावप्यनिरासः संवेत्तृभावात् । ३-३३।
सुख दुःखयोर्बहिर्मननम् । ३-३४।
तद्विमुक्तस्तु केवली । ३-३५।
मोहप्रतिसंहतस्तु कर्मात्मा । ३-३६।
भेद तिरस्कारे सर्गान्तर कर्मत्वम् । ३-३७।
करणशक्तिः स्वतोऽनुभवात् । ३-३८।
त्रिपदाद्यनुप्राणनम् । ३-३९।
चित्तस्थितिवत् शरीर चित्तस्थितिवत् करण बाह्येषु । ३-४०।
अभिलाषाद्बहिर्गतिः संवाह्यस्य । ३-४१।
तदारूढप्रमितेस्तत्क्षयाज्जीवसंक्षयः । ३-४२।
भूतकञ्चुकी तदा विमुक्तो भूयः पतिसमः परः । ३-४३।
नैसर्गिकः प्राणसंबन्धः । ३-४४।
नासिकान्तर्मध्य संयमात् किमत्र संयमात् सव्यापसव्य सौषुम्नेषु । ३-४५।
भूयः स्यात् प्रतिमीलनम् । ३-४६।
ॐ तत् सत्

Read More

August 25, 2018

क्या हमारे देश का नाम इंडिया से बदलकर भारत करना सही होगा ?

"इंडिया" नाम हमारे देश को ब्रिटिश शासकों ने दिया | कुछ लोग इसे "सिन्धु घाटी सभ्यता" से जोड़ते हैं , क्योंकि अंग्रेजी में उसे "इंडस वैली सिविलाइज़ेशन" (Indus Valley Civilization) कहते हैं , और "इंडस" शब्द से "इंडिया" शब्द तक पंहुचा जा सकता है | लेकिन असली मुद्दा ये है की जिस देश के 2% से भी कम लोग ही सही तरीके से अंग्रेजी बोल पाते हों , क्या उस देश का नाम अंग्रेजी में होना सही है | हमारे देश का हिंदी नाम "भारत" है , जिसका अपना एक अर्थ है , एक महत्व है , जो आपको इस लेख को पढ़ कर पता चलेगा |

इंडिया और इंडियन का शाब्दिक अर्थ क्या है ?

ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी को अंग्रेजी भाषा का सबसे बढ़िया शब्दकोष माना जाता है | सन 1900 की Oxford Dictionary के प्रष्ठ 789 में "India" और "Indian" शब्द का अर्थ  "Poor - Old fashioned - Criminal people" अर्थात "गरीब -पुराने विचारों वाले -अपराधी" है | ब्रिटिश राज में खास जगहों से भारतियों को वर्जित रखने के लिए "Dogs and Indians are Not Allowed" लिख कर बोर्ड लगा दिए जाते थे | कुछ विद्वान ये भी मानते हैं की "इंडिया" शब्द का शाब्दिक अर्थ है "वो दम्पति जिनकी शादी चर्च में नहीं हुई" अर्थात जिनकी शादी मान्य नहीं है | इसी प्रकार "इंडियन" शब्द का अर्थ है "नाजायज़ संतान" (Bastard), अर्थात एक ऐसे जोड़े की संतान जिनकी शादी मान्य नहीं है | आज़ादी के बाद भी ऐसे बोर्ड भारत में कई जगहों पर देखे गए हैं, जो उन लोगों की  मानसिकता को दर्शाते हैं जो भारतीय हो कर भी खुद को कुछ अलग समझते हैं |

भारत शब्द का अर्थ क्या है ?

कुछ समय पूर्व दक्षिण भारत के एक प्रसिद्ध सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने भारत शब्द का बड़ा ही गहरा अर्थ समझाया | उनके अनुसार भारत शब्द तीन शब्दों का संगम है , भा-रा-ता | "भा" का अर्थ है "भावना" जो हमारी इन्द्रियों के कारण उत्पन्न होती है , "रा" का अर्थ है राग या धुन , "ता" का अर्थ है ताल या तल | इस प्रकार भारत अर्थात वो तल (वो भूमि) जो आपको आपकी भावनाओ (इन्द्रियों) और अन्दर के राग को जानने का अवसर दे | ये अर्थ थोडा आध्यात्मिक है, लेकिन सटीक है | भारत सदा से सत्य के खोजियों की भूमि रही है | अनंत काल से सत्य की खोज में दुनिया भर से लोग इस धरती पर आते हैं | परन्तु आज का सत्य ये है की हम खुद ही इस धरती का उद्देश्य भूल चुके हैं | कुछ गिने चुने लोग ही आज भी इस धरती पर अध्यात्म को जीवित रखे हुए हैं | भारतवर्ष के अध्यात्म का अर्थ किसी धार्मिक शिक्षा से नहीं बल्कि सत्य की खोज से है | इसलिए भारत शब्द को किसी धर्म से नहीं जोड़ा जा सकता |

क्या भारत नाम राजा भरत के कारण पड़ा ?

महाकाव्य शाकुंतलम के अनुसार राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी शकुंतला के पुत्र राजा भरत हुए थे , जो बहुत ही अच्छे प्रजा-पालक थे , और उनको सम्मान देने के उद्देश्य से इस देश का नाम "भारत" रख दिया गया | यहाँ सोचने वाली बात ये है की क्या कोई व्यक्ति एक राष्ट्र से महान हो सकता है , कि उसके नाम पर राष्ट्र का नाम रख दिया जाए | राष्ट्र कोई पुस्तक नहीं है कि उसके लेखक के नाम पर उसका नाम रख दिया जाए | इस तथ्य को देखते हुए ऐसा होना असंभव सा प्रतीत होता है | हाँ लेकिन राष्ट के नाम पर किसी व्यक्ति का नाम हो सकता है |

क्या भारत एक हिन्दू धर्म का शब्द है ?

नहीं, कोई भी धर्म एक राष्ट्र को परिभाषित नहीं करता | ऐसा इसलिए क्योंकि धर्म का उद्देश्य राष्ट्र का निर्माण नहीं है बल्कि सत्य की खोज है | हिन्दू धर्म तो वैसे भी समस्त संसार को एक परिवार मानता है | अगर कोई धर्म किसी राष्ट्र का निर्माता बनेगा तो वो धर्म न रहके राजनीती हो जायेगा | जो व्यक्ति सच्चे अर्थों में अध्यात्म या धर्म को प्राप्त हो जाते हैं उन्हें तो राष्ट्र की सीमाएं समझ ही नहीं आती | आप किसी बुद्ध को या परमहंस को राष्ट्र की सीमाओं में नहीं बाँध सकते | भारत शब्द हिन्दू धर्म से उपजा हुआ नहीं है | कुछ लोग तो हिन्दू को धर्म ही नहीं मानते , बल्कि विभिन्न संस्कृतियों और समुदायों का एक संग्रह मानते है | "भारत" शब्द किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा बनाया गया होगा जिसे धर्म, अध्यात्म और राजनीति की परख होगी , जिसे पता होगा की राष्ट्र का नाम वहां के निवासियों को कैसे जोड़ सकता है |

क्या हमारे देश का नाम इंडिया से बदलकर भारत करना सही होगा ?

बिलकुल सही होगा | इंडिया शब्द आज भी हमारे देश के एक ब्रिटिश उपनिवेश होने का स्मृति चिन्ह है | ऐसे बहुत ही कम देश हैं जिनका अपनी भाषा में नाम कुछ और है और विश्व के मानचित्र पर कुछ और | ऐसे ज्यादातर राष्ट्र वो हैं जो किसी दुसरे देश के गुलाम रह चुके हैं | "इंडिया" नाम के साथ वो अर्थ और भावना नहीं जुडी हुई है जो "भारत" शब्द से जुडी हुई है | अगर ये भी मान लिया जाए की "इंडिया" शब्द सिन्धु नदी से बना है और इसका कोई गलत अर्थ नहीं है , तो भी ये केवल एक भोगौलिक जगह को ही दर्शाता है , जिसका कोई अध्यात्मिक अर्थ नहीं है | आज लोग अपने बच्चे का नाम भी ये देख कर रखते हैं कि उसका अर्थ क्या निकल रहा है , कई बार तो ऐसे नाम सामने आते हैं जिन्हें बोलना भी कठिन होता है | यहाँ तो देश के नाम की बात है | "भारत" शब्द न केवल बोलने में आसन है , बल्कि इसका अपना एक अर्थ और अध्यात्मिक महत्व भी है |

हो सकता है की आप में से कुछ ये कहें की देश का नाम बदलने से ज्यादा जरूरी और बहुत काम हैं सरकार के पास | लेकिन मेरा ये मानना है की अगर देश का नाम बदलने से देश की ज्यादातर जनसंख्या गोरवान्वित महसूस करे तो ऐसा करना चाहिए | वैसे भी ये नाम बदलने की मांग नहीं है , बल्कि एक गुलामों वाले नाम को छोड़ने की बात है | भारत तो इस भूमि का नाम सदा से रहा है | इस बारे में आपके क्या विचार हैं, वो नीचे कमेंट्स में जरूर बताएं |
Read More

August 22, 2018

क्या ये दिन देखने के लिए एक फौजी देश के लिए लड़ता है !

जब देश की सीमा पर कोई जवान शहीद होता है तो उस समय हमारी सरकारें उसके परिवार के लिए तरह-तरह की घोषणाएं करती हैं | उन घोषणाओं में से असलियत में कितनी कार्यान्वित होती हैं उनके बारे में कम ही लोगों को पता चलता है | लेकिन जो जवान वीरगति को प्राप्त नहीं होते, केवल ज़ख़्मी होते हैं, उन जवानों के बारे में कम ही लोगों को पता चलता है | हाल ही में एक समाचार पत्र में एक ऐसे ही वीर जवान की कहानी बताई गयी जो कारगिल युद्ध में दुश्मन से लोहा लेते हुए जख्मी हुआ और अपना एक पैर हमेशा के लिए खो दिया | उस वीर जवान को आज एक जूस की दूकान चला के अपने परिवार का पालन पोषण करना पड़ रहा है |

सतबीर सिंह ने राजपुताना राइफल्स में रहते हुए जम्मू कश्मीर में आठ साल से ज्यादा का समय बिताया और कारगिल युद्ध में दुश्मन से लोहा लेते हुए अपने पैर में गोली लगने के कारण हमेशा के लिए अपाहिज हो गए, जिसके चलते उन्हें voluntary retirement लेना पड़ा | उस समय उनकी पेंशन 4000 रूपए प्रतिमाह निर्धारित हुई थी | उस समय के नियमानुसार युद्ध में घायल फौजियों को सेनानिवृत करने पर खेती के लिए जमीन दी जाती थी , जिसके लिए उन्होंने सरकारी दफ्तरों के अनगिनत चक्कर काटे | ऐसे सेवानिवृत फौजियों के लिए पेट्रोल पंप का लाइसेंस देने का भी प्रावधान है | काफी दिक्कतों के बाद उन्हें एक एकड़ जमीन खेती के लिए दी गई जिसे साढ़े चार साल बाद वापस ले लिया गया |

कुछ समय पहले उनसे 40,332 रूपए प्रतिमाह पेंशन और बच्चों की पढाई का खर्चा सरकार द्वारा उठाने का वादा किया गया था, जो की अभी तक पूरा होता हुआ नज़र नहीं आता | पिछले दो दशकों में सतबीर सिंह जी ने मजदूरी, खेती, इलेक्ट्रिशियन जैसे काम कर के अपने परिवार का पालन पोषण भी किया और सरकारी दफ्तरों के चक्कर भी काटे | इस दौरान उनकी पेंशन 4000 रूपए से बढ़ कर करीब 23000 रूपए हो चुकी है, जो की परिवार की जिम्मेदारियों और बच्चों की पढाई के लिए पर्याप्त नहीं है | आज दिल्ली के नज़दीक एक गाँव में जूस की छोटी सी दूकान चला कर वो अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं |

अब 53 साल के हो चुके सतबीर सिंह जी के अनुसार यदि वो वीरगति को प्राप्त हो गए होते तो शायद उनके परिवार को इन दिक्कतों से गुज़ारना नहीं पड़ता | शहीदों के परिवारों के साथ शायद न्याय हो जाता है , उन्हें पैसों की मदद भी मिलती है और परिवार के एक सदस्य को नौकरी भी , लेकिन घायल फौजियों की दिक्कत की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता |

ऐसी सच्ची आपबीती सुनने के बाद मन में गुस्सा भी आता है और खुद का जनता का सेवक कहने वाले नेताओं का असली चेहरा भी नज़र आता है | पिछले दो दशकों में हर दल की सरकार रही है लेकिन ऐसे मुद्दों पर किसी ने काम नहीं किया | क्या देश के लिए लड़ना केवल एक मध्यमवर्गीय कर्मचारी या एक किसान के बेटे को धर्म है | कितने नेताओं और व्यापारियों के बच्चे फ़ौज में नौकरी करते हैं , अगर करते तो शायद ऐसा अन्याय नहीं होता | नेता यदि एक दिन भी संसद या विधान सभा में चला जाए तो उनकी उम्र भर की पेंशन बंध जाते है, लेकिन एक फौजी जो अपने अपने जीवन का सबसे ख़ास हिस्सा देश के लिए बलिदान करता है उसके हाथ क्या आता है | जब एक मध्यमवर्गीय या गरीब व्यक्ति सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता है तो शायद इतना दुःख नहीं होता , जो ऐसे फौजियों की कहानी सुन कर होता है |

जिस न्यूज़ आर्टिकल से ये जानकारी ले कर हिंदी में ये आर्टिकल लिखा गया है उसका लिंक नीचे दिया गया है |

Reference
https://m.dailyhunt.in/news/india/english/laughingcolours+english-epaper-laughcole/kargil+hero+now+runs+a+juice+shop+in+delhi-newsid-94536079

Read More

September 5, 2017

शिक्षक , अध्यापक और गुरु में क्या अंतर है

आज शिक्षक दिवस के शुभ अवसर पर सभी शिक्षकों को बधाइयाँ मिल रही हैं | लेकिन एक सत्य ये भी है की हमारा समाज शिक्षक शब्द का अर्थ भी भूलता जा रहा है | हम अध्यापक और शिक्षक को एक ही समझने लगे हैं | एक अध्यापक शिक्षक हो सकता है , लेकिन ये जरूरी नहीं की हर अध्यापक शिक्षक हो | इस बात को समझने के लिए आपको  शिक्षक , अध्यापक और गुरु जैसे शब्दों का शाब्दिक अर्थ पता होना जरूरी है | हिंदी एक अनूठी भाषा है | हम कुछ शब्दों को पर्यायवाची समझते हैं , जबकि असलियत ये है की हिंदी के हर शब्द का अर्थ अलग है | कुछ शब्द एक जैसे प्रतीत होते हैं , पर उनके असली अर्थ में कुछ बारीक फर्क जरूर होता है | शिक्षक और अध्यापक भी दो ऐसे ही शब्द हैं | जो लोग गुरु को शिक्षक समझने की भूल करते हैं , उन्हें तो अपनी शब्दावली को विकसित करने की जरूरत है |
शिक्षक: शिक्षक से हम शिक्षा प्राप्त करते हैं | शिक्षक वह व्यक्ति  है जो हमें जीवन में उपयोग में आने वाली चीज़ें सिखाता है | इसमें व्यावहारिक ज्ञान से लेकर हमारे त्योहारों और रीती रिवाजों तक का ज्ञान शामिल होता है | इसीलिये किसी भी व्यक्ति का सबसे पहला शिक्षक उसके माता पिता व् सगे सम्बन्धी होते हैं | शिक्षक हमें शिक्षा देने के बदले किसी आर्थिक लाभ की अपेक्षा नहीं रखते, बल्कि सम्मान की अपेक्षा रखते हैं |

अध्यापक : अध्यापक वह होता है जो हमें अध्ययन कराये | इसका अर्थ यह है की अध्यापक हमें किताबी ज्ञान देता है | इस तरह का ज्ञान हमें कागज़ी प्रमाणपत्र अर्थात डिग्री लेने में मदद करते हैं | अध्यापक किसी ऐसे संसथान का अंग होते हैं जो हमें कागज़ी ज्ञान देने के बदले अध्यापक को वेतन प्रदान करता है | कुछ अध्यापक हमें शिक्षक की भूमिका निभाते हुए भी मिलते हैं जो उन्हें बाकी अध्यापकों से अलग व् बेहतर बनता है |

गुरु : गुरु वह होता है जो हमें सबसे उच्च कोटि का ज्ञान दे | उच्च कोटि के ज्ञान का अर्थ आध्यात्मिक ज्ञान | ये ज्ञान हमें एक साधारण मनुष्य से कुछ अधिक बना देता है | ये वह ज्ञान है जो हमें किसी शिक्षक या अध्यापक से प्राप्त नहीं हो सकता | एक अध्यापक या शिक्षक हमें अपने जन्म या धन से मिल सकते हैं , किन्तु एक गुरु को आपका ढूँढना व् अर्जित करना पड़ता | किसी गुरु का शिष्य बनने के लिए आपका अपनी पात्रता सिद्ध करनी पड़ती है | एक शिक्षक या अध्यापक जब आपको शिक्षा देता है हो उसके पीछे उसका कुछ स्वार्थ निहित होता है , लेकिन एक गुरु का ज्ञान निस्वार्थ होता है |
इन तीन के अलावा शुद्ध हिंदी में कुछ अन्य भी मिलते जुलते शब्द हैं जो अक्सर प्रयोग में लाये जाते हैं लेकिन किसी को उनका असली अर्थ नहीं पता |

आचार्य: आचार्य वह व्यक्ति होता है जो अपने द्वारा अर्जित ज्ञान को अपने आचरण / व्यव्हार का अंग बना लेता है और फिर उस ज्ञान को अपने शिष्यों को देता है | आचार्य एक ऐसी स्तिथि है जो अध्यापक से कुछ अधिक है और गुरु से कुछ कम |
प्राचार्य : प्राचार्य आचार्य से श्रेष्ठ होता है | प्राचार्य ये सुनिश्चित करता है की जिसको वह ज्ञान दे रहा है वो भी उस ज्ञान को अपने व्यव्हार का अंग बना रहा है |

आज के दौर में जहाँ किताबी ज्ञान का बोल-बाला है वहां माता पिता यह भूलते जा रहे हैं की आपके बच्चे को विद्यालय में अध्यापक अवश्य मिल जायेंगे किन्तु शिक्षक नहीं | आज के दौर में बच्चों को सर्वाधिक आवश्यकता एक अच्छे शिक्षक की होती है , जो बहुत कम माता-पिता या अध्यापक बन पाते हैं | एक अच्छे शिक्षक के आभाव में बच्चे पढ़ तो जरूर लेते हैं किन्तु वो व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाते जो उन्हें एक उच्च कोटि का ज्ञानवान मनुष्य बनाये |

Whatsapp पर शेयर करें
Read More

January 30, 2017

क्या आतंकवाद को किसी के धर्म से जोड़ना सही है ?

वैसे तो आतंकवाद का कोई मज़हब नहीं होता | चंद  सिरफिरे लोगों की वजह से आतंकवाद को किसी धर्म से जोड़ना सही नहीं है | लेकिन ये भी सभी जानते हैं की दुनिया भर में किस धर्म से जुड़े हुए लोग आतंकवाद में सबसे ज्यादा लिप्त हैं | नौ -ग्यारह का आतंकवादी हमला , ओसामा-बिन-लादेन , ISIS और न जाने कितने आतंकवादी हमले एक ही धर्म को इन हमलों से जोड़ते हैं | लेकिन फिर भी एक संवेदनशील इंसान आतंकवाद को किसी धर्म से नहीं जोड़ेगा | आतंकी गतिविधियों में लिप्त ज्यादातर युवा या तो भटके हुए हैं, या भड़काए हुए हैं, या किसी व्यक्तिगत फायदे के लिए आतंक फ़ैलाने में लगे हैं | लेकिन ये भी सच्चाई है की सभी विचारक इतने संवेदनशील नहीं हैं | कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो बिना किसी की संवेदना की चिंता करे सच बोलना ही अपना धर्म मानते हैं |

आज के समय में ज्यादातर सवालों के जवाब Google पर आराम से मिल जाते हैं | इसलिए हमने Google Trends की मदद से ये जानने की कोशिश करी की दुनिया क्या सोचती है |  Google Trends के जरिये हम ये जान सकते हैं की दुनिया में लोग किन शब्दों को ज्यादा search करते हैं | धर्म और आतंकवाद को जोड़ कर देखने के लिए हमने नीचे दिए गए शब्दों को जांच में प्रयाग किया |


यदि आप ग्राफ्स को समझते हैं तो आपको ये जानने में दिक्कत नहीं होगी की दुनिया भर में लोग किस धर्म को आतंकवाद से जोड़ कर देखते हैं | आप ये जानकारी इस compare लिंक पर जा कर भी देख सकते हैं |  आप में से कुछ लोग ये भी कह सकते हैं की यह जानकारी एकतरफा है , और इस्लाम की मान्यता भी विश्व में काफी ज्यादा है | इसलिए हमने Google Trends पर इन्ही धर्मों के नाम search कर के देखे | इसका जो परिणाम आया वो नीचे दिया गया है |


इस परिणाम से ये स्पष्ट हो गया है की किस धर्म की मान्यता ज्यादा है | इसे Google Trends में देखने के लिए compare लिंक पर देख सकते हैं |

जिन परिवारों ने आतंकवादी हमलों में अपनों को खोया है , वो आतंकवाद को उसके धर्म या जाती से जरूर जोड़ेंगे | ये इंसानी फिदरत है | आप कितना ही समझाओ की वो आतंकवादी थे और उनका कोई ईमान या धर्म नहीं है , वो नहीं समझेंगे |

कट्टरता किसी भी धर्म में हो , वो सही नहीं है | एक सच्चा धार्मिक व्यक्ति कट्टर हो ही नहीं सकता | और अगर वो कट्टर है तो इसका मतलब सिर्फ इतना है की उसे अपने धर्म का सही ज्ञान ही नहीं है |

यहाँ दिए गए तथ्यों से किसी की धार्मिक मान्यता को ठेस पहुचना हमारा मकसद नहीं है | लेकिन ये सभी तथ्य ये साबित करने के लिए काफी है की खोट हम सब में है | किसी में कम है, किसी में ज्यादा | जिनमे ज्यादा है , उन्हें अपने नौजवानों को ज्यादा समझाने की जरुरत है | ज्यादातर नौजवान ही आतंकवाद की बीमारी से ग्रस्त हैं | यदि आज से सभी धर्मों के परिवार अपने बच्चों को गलत संगत से बचाएँ और सही मार्गदर्शन दें तो आने वाले २०-२५ सालों में आतंकवाद की बीमारी को कम किया जा सकता है |

Read More

January 29, 2017

भारतीय धर्मनिर्पेक्षता : एक राजनितिक छल

धर्मनिर्पेक्षता (Secularism), भारत में इस्तेमाल होने वाला एक ऐसा शब्द बन गया है जिसका उपयोग किसी की भलाई के लिए कम, राजनितिक दलों के इस्तेमाल के लिए ज्यादा हुआ है | यदि आप भारतीय धर्मनिर्पेक्षता के बारे में ज्यादा जानकारी एकत्र करेंगे तो पाएंगे की ये वास्तव में धर्मनिर्पेक्षता है ही नहीं | भारतीय संविधान में धर्मनिर्पेक्षता को एक कानून के रूप में ठीक से लागू किया ही नहीं गया, न ही इसकी कोई सही परिभाषा लिखी गयी | Wikipedia पर Secularism in India नामक एक लेख में ये बात सही तरीके से बताई गयी है | वहां नीचे दी गयी पंक्ति हुबहू लिखी गयी है |

  • "Neither India's constitution nor its laws define the relationship between religion and state."
  • "Religious laws in personal domain, particularly for Muslim Indians, supersede parliamentary laws in India; and currently, in some situations such as religious indoctrination schools the state partially finances certain religious schools. These differences have led a number of scholars[8][30][31] to declare that India is not a secular state, as the word secularism is widely understood in the West and elsewhere; rather it is a strategy for political goals in a nation with a complex history, and one that achieves the opposite of its stated intentions."

जहाँ एक तरफ भारतीय संविधान सभी धर्मों को मान्यता देता है, और किसी एक धर्म को भारत का राष्ट्रीय धर्म नहीं मानता , वहीँ दूसरी तरफ मुस्लिम धर्म को अलग धार्मिक कानून मानने की अनुमति देता है | यही बात भारतीय धर्मनिर्पेक्षता को बाकी दुनिया की धर्मनिर्पेक्षता से अलग करती है | हालाकि भारत में हिन्दू धर्म की जनसंख्या सबसे ज्यादा है, फिर भी उनको व् अन्य सभी धर्मों को एक ही कानून मानना पड़ता है |

कौन धर्मनिरपेक्ष और कौन धार्मिक ?

भारत में जो व्यक्ति या संस्था हिन्दुओं के हितों को ध्यान में रख के बात करे , उस पर राजनितिक दल "धार्मिक" होने का आरोप लगाते हैं , और जो मुस्लिमों के पक्ष में बोले वो धर्मनिरपेक्ष | तसलीमा नसरीन का एक वक्तव्य इस बात को साबित करने के लिए काफी है |


भारत में आप किसी भी धर्म की धार्मिक भावनाओ से खेल सकते हैं, लेकिन मुस्लिमों की नहीं (ये तसलीमा नसरीन के विचार हैं )|  वैसे तो किसी भी धर्म की धार्मिक भावनाओ से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए लेकिन सबको एक कानून मानने को विवश करना ही सही धर्मनिर्पेक्षता है | नीचे दी गयी अखबार की कटिंग शायद आपका ध्यान इस ओर खींचे |

मुस्लिमों को अलग कानून मानने की अनुमति देना "समानता के अधिकार" का भी उलंघन है | वैसे तो आरक्षण भी समानता के अधिकार का उलंघन है, लेकिन वो अलग विषय है | भारतीय संविधान ऐसी गलतियों से भरा पड़ा है , लेकिन ये कहने वालों को भी धार्मिक होने का आरोप झेलना पड़ता है | भारत की इसी धर्मनिर्पेक्षता की वजह से आज भी बाल-विवाह , बहु-विवाह (polygamy) व् ट्रिपल-तलाक जैसे विवादस्पद विषय आज भी भारत में चर्चा का विषय बने हुए हैं | कई हिन्दू संघटन मुस्लिमों पर अपनी जरुरत के हिसाब से कानून का इस्तेमाल करने का भी आरोप लगाते हैं| वे कहते हैं की शादी से सम्बंधित चीज़ों में ये शरियत कानून मानते हैं लेकिन अन्य फौजदारी (चोरी, मर्डर व् अन्य) मुकदमों में ये कॉमन सिविल लॉ मानते हैं, क्योंकि शरियत के हिसाब से उसकी सजा ज्यादा कठिन है |

कुल मिला कर धर्मनिर्पेक्षता को आज तक सिर्फ राजनितिक फायदे के लिए ही इस्तेमाल किया गया है | सब दलों को ये पता है की यदि कोई दल सही मायनों में धर्मनिर्पेक्षता को लागू करेगा तो उसे मुस्लिम वोटों से हाथ धोना पड़ेगा | और जो दल थोडा बहुत भी हिन्दुओं के लिए काम करेगा उसे धार्मिक दल होने का आरोप सहना पड़ेगा |
Read More